आज अत्यधिक ठंड थी। ना कल सूरज निकला और ना आज।कल तो पूरे दिन रिमझिम की लड़ी लगी रही। यों तो ठंड में मैं कभी भी घर से बाहर नहीं निकलना चाहती हूँ लेकिन ऐसे मौसम में जंगल का मनमोहक स्वरूप देखने के लिए मैं सदैव तत्पर रहती हूँ, तो चल दी सुबह-सवेरे ट्रेक करने।
सूरज ना निकलने के कारण, वातावरण धुंधला सा था। जंगल की सौंधी-सौंधी खुशबू मन में उमंग सी भर रही थी। मेरा ट्रेक बस समाप्त ही होने वाला था कि मैंने वहाँ एक महिला को रास्ते के बीचों-बीच देखा। अरावली के बेरंग से जंगल में यह महिला चटकीला रंग के कपड़े पहने उकड़ू बैठी थी। सामने रखी थी लकड़ियों की गठरी जो वह जंगल से काट कर लाई थी। घर वापिस जाने से पहले, वह होठों में बीड़ी दबाए कुछ देर सुस्ता रही थी।
भारत के किसी भी कोने में चले जाओ “राम रामजी”, ये दो शब्द जब अपरिचित व्यक्ति को लय में बोले जाते हैं तो उसकी सब झिझक मिटा देते है। चमेली के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ। जैसे ही मैंने “राम रामजी” कहा, जवाब में वह “राम रामजी” कहते हुए मुस्कुरा दी। उस मुस्कुराहट के साथ चमेली का चेहरा और भी आकर्ष लग रहा था। मैंने उसकी फोटो खिचने की अनुमति ली तो वह खुश हो गई। बीड़ी अपने चेहरे से दूर कर वह जच के बैठ गई।

लेकिन बीड़ी के बिना उसकी तस्वीर कुछ अधूरी सी लग रही थी। मैंने उससे एक कश भरने का आग्रह किया। चमेली ने शर्माते हुए, कुछ मुस्कुराते हुए बीड़ी का एक कश भरा और मैंने उसका यह रूप फोटो मैं कैद कर लिया।
चमेली के चेहरे की गहरी रेखाएँ बता रही थी कि वह गाँव की एक मेहनती औरत है जो बहुत शारीरिक श्रम करती है। जीवन की कठिन परिस्थितियाँ उसे परास्त नहीं कर पाई। लगता है वह हर फ़िक्र को धुएँ में उड़ा देती है और मुस्कुराती रहती है।
