The jigsaw puzzle of my life!!

The story of my life is so similar to this jigsaw puzzle patchwork I set out to sew. To make this puzzle, the cloth was cut into pieces and so was my life. I was broken and shattered. Each piece looked different from the other. The pieces seemed asymmetrical and thus they did not fit into the puzzle. How would I sew them together? How I would I gather my shattered self?

The colours too, were different from one another. Red, did not make sense with yellow. Green was so different from white. They were all so bright, blinding me in the eye. I wished the colours were not so stark for if I put them together the follies would be visible from afar.

I was overwhelmed with the task of stitching the patches and equally perturbed in my life. To save myself from further agony, I locked away the pieces in the closet because I was sure in the dark of the night, God would take pity on my soul and send the little elves my way to sew the patches together. Similarly, I let my life sulk and remain battered in a hope that an armoured knight will come to sweep me off my feet! I waited for the elves and the knight alike. None came and life went along unchanged.

The time moved on and did not make a difference till I made the effort to pick the threads and swatches of fabric, to sew them into an intricate pattern. I stitched with passion. I was mistaken, the passage of time did make a difference. The feelings of dismay that once overwhelmed me had abated. The failure in the context I once was, had changed. The different colours now made sense. As I sewed, I understood that it was not important to be of the same hue to fit into the puzzle. Rather, the vibrant colours brought life to the otherwise dishevelled and mundae piece of art.

Out of the closet, my tattered life too, now resembled the rich filigree which bedazzles everyone with its shadow play. There was light, so there were shadows and so there was the shadow play!! The shadows personify darkness but at this juncture, for me they meant the prevalence of light round the corner.

Friends and relatives, started to fill the empty spaces with love and advice. I took some and let the others be!! The filled lattice looked more like a jigsaw puzzle that had finally fallen into place. Each shape was part of the bigger picture. Each colour whether dark or light, gave meaning to life! Once, I tried to remove the ‘dark’ piece but there was none to substitute. Now that I look from afar, I realise, the ‘dark’ gives depth to the picture. It brings out the vibrance of colours and ‘life’ alike.

The effort paid off. The jigsaw puzzle was complete. Here I have an exquisite work to show off by an equally vibrant person that’s me!!

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स्पर्श…अमूल्य है!

इन वर्षों में, मैंने महसूस किया है कि एक घटना, एक व्यक्ति, कोई कला या किसी अन्य चीज के बारे में विचारों को कलमबद्ध करने में हम असमर्थ हैं जिसके बारे में हम अत्याधिक भावुक हैं। मुझे लगता है कि इसके पीछे की सोच यह है कि एक लेखक के रूप में मैं अनुभव की गहराई, इसके साथ जुड़ी भावनाओं को व्यक्त करने में न्याय नहीं कर पाऊँगी और इस प्रकार, हर बार मैं इसके बारे में कुछ और समय के लिए लिखना छोड़ देती हूँ …

हाल के दिनों में, मुझे एक ऐसी ही पारीस्थिति का सामना करना पड़ा। मेरी नानी, जो 88 साल की हैं, अचानक गिर गईं। वह अत्यधिक दर्द से पीड़ित थी और मैं उनसे मिलने गयी। इस मुलाक़ात के दौरान मुझे यह गहरा अनुभव हुआ जिसे मैं आपके साथ बाँटना चाहती हूं। इस घटना को लगभग एक महीना हो गया है और मैं इस के बारे में विचार-विमर्श करती रहती हूँ… लेकिन अभी तक, मैं अपने विचारों को सबके सामने रखने में विफल रही हूँ। इसे प्रस्तुत करने के लिए कभी मुझे एक शुरुआत मिल जाती है और कई बार, जब मेरा दिमाग सही शुरुआत के लिए वाक्यों को बुनना शुरू करता है, तो शब्द मुझे विफल कर देते हैं। चलो एक बार फिर से कोशिश करती हूँ।

मेरी नानी, मेरे दिल के सबसे करीबी व्यक्तियों में से हैं। वह वास्तव में एक प्रेरणा का स्त्रोत्र हैं और मैं जब भी कभी हताश होती हूँ, मैं उनकी तरफ प्रेरित होने के लिए देखती हूँ। उन्होंने 80 से अधिक व्यक्तियों के परिवार को बांधे रखा है। हम इतनी संख्या में हैं कि जब लोग हमारे परिवार की तस्वीर देखते हैं, तो वे इसे ‘जिला’ घोषित करते हैं। नानीजी ने भौतिक दूरी और कभी भावनात्मक दूरी के बावजूद, हम सबको एक साथ बंधे रखने के लिए, पूरा जीवन  धैर्य व दृढ़ संकल्प से काम लिया।

यही नहीं, वह अपार शारीरिक और मानसिक शक्ति की महिला हैं। वह अतीत में बीमार रही हैं, लेकिन अपने दृढ़ संकल्प के कारण, वह बहुत जल्द अपने पैरों पर वापस खड़ी हो गई। यहां तक कि एक बार आकस्मिक गिरने के बाद उन्होंने हिप-ज्वाइंट रिप्लेसमेंट सर्जरी करवाई और उनके सकारात्मक रवैये के कारण तेजी से रिकवरी हुई।

इस बार जब वह गिर गई, तो उनकी अपनी tail bone को चोट पहुंच गयी। युवा व्यक्ति के लिए भी टेलबोन की एक चोट बेहद दर्दनाक है, और इस उम्र में, दर्द एक-साथ कई दिनों के लिए असहनीय था। इस चोट के कारण, उनसे अनजाने में मूत्र और मल अनायास निकल जाता था। कहने की जरूरत नहीं है, वह अपमानित महसूस कर रही थीं। सभी अपमानों और पीड़ाओं से खुद को बचाने के लिए, केवल एक चीज उन्होंने भगवान से मांगी थी कि मृत्यु उन्हें मिले और इस तड़पने से राहत मिले।

हालांकि इस चोट के लगभग 20 दिन हो चुके थे लेकिन दर्द कम नहीं हुआ था। जैसे ही मैं उसके कमरे में दाखिल हुई, मैं नानी को अपने बिस्तर पर, एक तरफ़ करवट में पड़ा देख कर दिल टूट गया। उनका चेहरा सूजा हुआ था और वह दर्द के कारण मुश्किल से बात कर पा रही थी। मुझे इससे भी अधिक दुख हुआ कि वह वहाँ  पराजित अवस्था में लेटीं हुई थी। मेरी नानी, जो हमेशा बाधाओं के खिलाफ जीवन में खड़ी रही, आज हताश होकर निर्जीव सी पड़ी हुई थी।

मैं उनकी मदद के लिए कुछ करना चाहती थी। मेरे दिमाग में एक ही बात आई – मंत्र उच्चारण करने की ! मैं अपनी प्रार्थनाओं से उन्हें ठीक करने की कोशिश कर सकती थी। मैं उनके सिराहने बैठ कर मंत्र का जाप करने लगी। नानीजी ने अनजाने में अपना हाथ मेरी गोद पर रख दिया या उन्होंने अपना हाथ वहाँ रख दिया क्योंकि मैं उनके पास बैठा थी… मुझे नहीं पता! लेकिन बात यह ध्यान देने कि है कि उन्होंने अपना हाथ मेरी गोद में रखा। आप आश्चर्यचकित हो सकते हैं कि मेरी गोद में नानी के हाथ के बारे में यह चर्चा क्यों? असल में यह वही घटना है जिसके बारे में मैं अपने भाव व्यक्त करना चाहती हूँ।

मेरी नानी एक बच्चे की तरह मेरे बग़ल में आ गई और यह स्पष्ट हो गया कि उन्हें ‘स्पर्श!!’ की आवश्यकता थी और यह यहाँ है … कि शब्द मुझे विफल करने लगते हैं …भावना का वर्णन करना बहुत मुश्किल है लेकिन मैं इस पर लिखने का वादा करती हूँ ।

मुझे लगा कि नानीजी परिवार का मुखिया का पद सँभालते सँभालते थक गई हैं। वह एक बार फिर एक छोटी लड़की बनना चाहती थी, जिसे सहलाया और पुचकारा जा सकता था। या शायद एक बच्ची जो चोट लगने पर अपनी माँ की गोद में शरण ले सकती है। या एक लड़की, जो अपनी सबसे अच्छी सहेली का हाथ पकड़ सकती है और विपत्ति के समय में सांत्वना पा सकती है। यदि ऐसा नहीं है, तो शायद वह एक युवती/महिला बनना चाहती थी जो अपने पति के बगल में तसल्ली पा सके।

जैसे-जैसे हम बड़े होते हैं, हम शारीरिक रूप से एक दूसरे से दूर होते जाते हैं। इसके बारे में विस्तार से सोचो … हम अपने बड़े किशोर अवस्था के बच्चों को कितनी बार गले लगाया करते हैं? क्या हम कभी अपने माता-पिता का हाथ पकड़ते हैं? हमारी शादी में 15 साल या उससे अधिक हो जाए तो क्या हम अपने जीवनसाथी का हाथ थामते हैं?

शातिर या गंदा स्पर्श यह भी बताता है कि इसे पेश करने वाले व्यक्ति के दिमाग में क्या है, लेकिन अभी मैं इस पहलू को छोड़ दूंगी और उस सुंदर स्पर्श पर ध्यान केंद्रित करूंगी जो हम सभी चाहते हैं। न ही मैं कामुक स्पर्श के क्षेत्र में उद्यम करूंगी। तो, यह सरल स्पर्श, दुलार, या मेरे द्वारा उल्लिखित गले लगाना, शिशुओं, पालतू जानवरों, दोस्तों, भाइयों और बहनों, रिश्तेदारों, जीवन साथी और सभी लोगों के लिए आरक्षित है।

नानीजी इस ‘सरल स्पर्श’ के लिए तड़प रही थीं। सरल अपितु आश्वस्त-स्पर्श जिसे हम अनदेखा करते हैं। जैसे ही मुझे इस बात का अहसास हुआ, मैंने भी   उनके सिर पर हाथ फेरा और उन्होंने कोई प्रतिरोध नहीं किया। उन्हें इसे सुखदायक पाया और एक गहरी नींद में सो गई। स्पर्श उनके लिए बहुत महत्वपूर्ण था। शायद यह एक जादूई औषधि के रूप में काम करता है और किसी भी रोगी को दी जाने वाली दवाओं की तुलना में कहीं अधिक प्रभावी है।

साधारण स्पर्श कहता है, "मैं तुम्हारे लिए हूँ!"

दुलार या कोमल भरा स्पर्श कहता है, "मुझे तुम्हारी परवाह है!"

बड़ा गले लगाने वाला स्पर्श कहता  है, "मैं तुमसे प्यार करता हूँ!"

परिवार में हर कोई, उनकी अच्छे से देखभाल कर रहा था और ‘लाक्डाउन’ के समय में उन्हें सबसे अच्छी चिकित्सा प्रदान करने के लिए चौबीसों घंटे काम कर रहे थे। वे उन्हें आराम देने के लिए लगातार उनके पैरों की मालिश कर रहे थे। और मुझे यकीन है कि उन्होंने उनके सिर को भी प्यार से सहलाया होगा। लेकिन वह इससे ज्यादा चाहती थी। संभवतः स्पर्श किसी भी अन्य दवा की तुलना में कहीं अधिक आराम प्रदान कर रहा था।

उस स्पर्श के कारण नानीजी ने महसूस किया कि उन्हें खड़ा होने की आवशकता नहीं थी, उनके पास पस्त होकर गिरने का विकल्प था क्योंकि वह जानती थी कि उसकी देखभाल की जाएगी। उनकी तरह, हम भी प्यार भरे स्पर्श के लिए तरस रहे हैं। आइए इसे स्वीकार करते हैं, हम, सामान्य मनुष्यों को लगातार मानवीय स्पर्श कीआवश्यकता होती है। हम इस इच्छा को व्यक्त नहीं कर सकते हैं या इसके बारे में बात करने में शर्म भी महसूस कर सकते हैं लेकिन तथ्ययह है कि स्पर्श चमत्कार कर सकता है। यह हमारे मनोबल को बढ़ा सकता है और हमारे दिल को गर्व से भर सकता है। यह हमारे घबराए मन को शांत करने के लिए एक बाम के रूप में कार्य कर सकता है।

मुझे आशा है कि मैं अपने अनुभव की गहराई को व्यक्त करने में और मन को छू जाने वाला संदेश को आप सब तक पहुँचाना में सक्षम हुई हूँ। मैं कोई साहित्यकार नहीं हूँ, मैं लिखती हूँ बस ‘दिल से’!

अगली बार, जब आप बड़ों के साथ बैठें, तो उनका हाथ थम लें और बिना किसी कारण के उन्हें गले लगायें। क्या मैंने ये सब करना शुरूकर दिया है? बहुत ईमानदारी से जवाब दूँ तो यह विचार अभी भी अजीब लगता है। बचपन से हमें एक दूरी बनाए रखने और स्नेह के सार्वजनिक प्रदर्शन न करें, यह सिखाया जाता है। इसलिए, मुझे एक शुरुआत करने में थोड़ा समय लग रहा है। अगर मैं नहीं, तोआप शुरूआत कर सकते हैं। जी हाँ, मैं  आप ही से कह रही हूँ …इस लेख के पाठक!

अपने जीवन के विशेष लोगों के जीवन को ‘स्पर्श’ के साथ छू लें! अपने बच्चों और माता-पिता को गले लगाएँ…हर रोज़ !!